मनेंद्रगढ़ सिविल अस्पताल में नवजात की मौत से उठे सवाल, जांच समिति गठित कर विभाग ने झाड़ा पल्ला? पहले भी उठे थे लापरवाही के आरोप, कार्रवाई का इंतजार!

प्रसव के बाद नवजात की हालत बिगड़ने, हाथ-पैर की हड्डियों में फ्रैक्चर की बात सामने आने और रायपुर में मौत के मामले की जांच शुरू; निजी अस्पताल में महिला की मौत के बाद गठित जांच समिति की कार्रवाई पर भी सवाल

रिपोर्टर: सुरेंद्र मिनोचा

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मनेंद्रगढ़ सिविल अस्पताल में नवजात की मौत से उठे सवाल, जांच समिति गठित कर विभाग ने झाड़ा पल्ला? पहले भी उठे थे लापरवाही के आरोप, कार्रवाई का इंतजार!

मनेंद्रगढ़। एमसीबी जिले के मनेंद्रगढ़ स्थित 220 बिस्तरीय सिविल अस्पताल में प्रसव के बाद नवजात शिशु की मौत के मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था और मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों की शिकायत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने पांच सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है। समिति पीड़ित परिवार के बयान दर्ज कर मामले से जुड़े तथ्यों की पड़ताल कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बार जांच केवल बयान दर्ज करने और रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित रहेगी, या जिम्मेदारों पर वास्तव में कोई कार्रवाई भी होगी?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पहले एक निजी अस्पताल में कथित चिकित्सकीय लापरवाही के बाद महिला की मौत के मामले में भी जांच समिति गठित की गई थी। उस मामले में जांच के बाद क्या कार्रवाई हुई, जिम्मेदारी किसकी तय की गई और दोषियों के विरुद्ध क्या कदम उठाए गए,इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। यदि पुराने मामलों की जांच और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक नहीं होती, तो नई जांच के निष्कर्षों और उसके परिणामों पर भी लोगों का भरोसा कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।

प्रसव के बाद बिगड़ी नवजात की हालत, रायपुर में हुई मौत

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मनेंद्रगढ़ के लालपुर निवासी आमटी कुमार रवि ने 10 सितंबर 2026 को अपनी पत्नी को प्रसव के लिए 220 बिस्तरीय सिविल अस्पताल में भर्ती कराया था। परिजनों के मुताबिक, प्रसव के बाद उन्हें बताया गया कि नवजात ने पानी पी लिया है। इसके बाद बच्चे को बेहतर उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज अंबिकापुर रेफर किया गया।

परिजनों का आरोप है कि अंबिकापुर में जांच के दौरान एक्स-रे में नवजात के दोनों पैरों और हाथ की हड्डियों में फ्रैक्चर होने की बात सामने आई। इसके बाद बच्चे को रायपुर स्थित मेकाहारा अस्पताल भेजा गया, जहां उपचार के दौरान 4 अक्टूबर को उसकी मौत हो गई।

नवजात की मौत के बाद परिवार के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं। बच्चे की हड्डियों में फ्रैक्चर किन परिस्थितियों में हुआ? प्रसव और उसके बाद के उपचार के दौरान क्या-क्या हुआ? क्या नवजात को समय पर समुचित उपचार और जरूरी चिकित्सकीय निगरानी मिली? इन सवालों का जवाब चिकित्सकीय अभिलेखों, विशेषज्ञों की राय और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकेगा।

शिकायत के बाद हरकत में आया स्वास्थ्य विभाग

नवजात की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन और थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। परिवार चाहता है कि उपचार के दौरान हुई घटनाओं की पड़ताल कर जिम्मेदारी तय की जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

शिकायत के बाद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. अविनाश खरे ने पांच सदस्यीय जांच दल गठित किया है। जांच टीम पीड़ित परिवार के घर पहुंची और परिजनों के बयान दर्ज कर मामले से संबंधित जानकारी जुटाई।

हालांकि, जांच समिति का गठन अपने आप में कार्रवाई का अंतिम परिणाम नहीं है। असल सवाल यह है कि जांच कितनी निष्पक्षता और समयबद्धता से पूरी होती है, चिकित्सकीय दस्तावेजों की कितनी गहराई से पड़ताल की जाती है और रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

पहले भी गठित हुई थी जांच समिति, अब पुराने मामले की कार्रवाई पर सवाल

मनेंद्रगढ़ सिविल अस्पताल में नवजात की मौत से उठे सवाल, जांच समिति गठित कर विभाग ने झाड़ा पल्ला? पहले भी उठे थे लापरवाही के आरोप, कार्रवाई का इंतजार! (2)

मनेंद्रगढ़ में एक निजी अस्पताल में कथित लापरवाही के बाद महिला की मौत के मामले में भी जांच समिति गठित किए जाने की बात सामने आई थी। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को पुराने मामले में हुई जांच और उसके बाद की कार्रवाई की स्थिति भी स्पष्ट करनी चाहिए।

क्या उस मामले की जांच पूरी हुई? यदि रिपोर्ट तैयार हुई, तो उसके निष्कर्ष क्या थे? क्या किसी चिकित्सक या अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी तय की गई? क्या कोई दंडात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई हुई? यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो इसके पीछे क्या कारण रहे?

इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है। आखिर जांच समितियां गठित होने के बावजूद यदि उनके निष्कर्षों और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक नहीं होती, तो आम लोगों के मन में यह संदेह पैदा होना स्वाभाविक है कि कहीं जांच केवल औपचारिकता बनकर तो नहीं रह गई है।

अस्पताल प्रबंधन का दावा,लापरवाही मिली तो होगी कार्रवाई

220 बिस्तरीय सिविल अस्पताल के अधीक्षक डॉ. स्वप्निल तिवारी के अनुसार, मामले की जांच की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि उपचार में लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

अस्पताल प्रबंधन का यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, लेकिन अब इसकी कसौटी जांच के निष्कर्ष और उन पर होने वाली कार्रवाई होगी। परिजनों को न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि जांच में किसी स्तर पर पक्षपात न हो और यदि लापरवाही प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदारों को जवाबदेह बनाया जाए।

जांच रिपोर्ट का इंतजार, लेकिन कार्रवाई कब होगी?

नवजात की मौत का मामला केवल एक परिवार की पीड़ा तक सीमित नहीं है। यह सरकारी अस्पतालों में प्रसव के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों, नवजात की सुरक्षा, रेफरल व्यवस्था और उपचार की जवाबदेही से जुड़े गंभीर प्रश्न भी सामने लाता है।

अब स्वास्थ्य विभाग के सामने दोहरी जिम्मेदारी है,वर्तमान मामले की निष्पक्ष जांच कर तथ्यों को स्पष्ट करना और पूर्व में गठित जांच समितियों की कार्रवाई की स्थिति भी सामने लाना। जांच में देरी, निष्कर्षों को लेकर अस्पष्टता और कार्रवाई की जानकारी का अभाव लोगों के भरोसे को प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल नवजात की मौत के मामले में चिकित्सकीय लापरवाही की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। लेकिन स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि जांच कब तक पूरी होगी, रिपोर्ट के आधार पर क्या कार्रवाई की जाएगी और पहले के मामलों में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

अब देखना यह है कि यह जांच भी केवल समिति गठन और आश्वासन तक सीमित रहती है या स्वास्थ्य विभाग वास्तव में जवाबदेही तय कर कोई ठोस कदम उठाता है।

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