रायपुर, 19 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ ने वन विभाग के कार्यों में ठेका पद्धति लागू किए जाने के हालिया प्रयास तथा फ्रंट लाइन स्टाफ (वर्दीधारी बल) की पदस्थापना एवं स्थानांतरण के लिए प्रस्तावित नई विभागीय स्थानांतरण नीति का कड़ा विरोध किया है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुवे ने इन प्रस्तावित व्यवस्थाओं को प्रदेश के मूल निवासियों, वनवासियों, ग्रामीणों और वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों के आर्थिक एवं सेवा हितों के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है।
प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुवे ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख वनाच्छादित राज्यों में शामिल है और प्रदेश के लाखों ग्रामीण एवं आदिवासी परिवार प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जंगलों और वन विभाग से जुड़े स्थानीय कार्यों पर निर्भर हैं। वृक्षारोपण, नर्सरी प्रबंधन, कूप कटाई, वन सुरक्षा, जल संरक्षण सहित विभिन्न स्थानीय कार्यों से ग्रामीणों को रोजगार प्राप्त होता है, जिससे उनकी आजीविका चलती है।
ठेका पद्धति लागू होने पर स्थानीय रोजगार प्रभावित होने की आशंका
संघ ने आरोप लगाया है कि यदि वन विभाग में बड़े पैमाने पर ठेका पद्धति लागू की जाती है तो बाहरी ठेकेदार अपने आर्थिक हितों के अनुसार मशीनों अथवा बाहरी श्रमिकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में स्थानीय वनवासियों और ग्रामीणों को मिलने वाला रोजगार प्रभावित होने की आशंका है।
अजीत दुवे का कहना है कि जिन ग्रामीणों की पीढ़ियां जंगलों के संरक्षण और वन संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ी रही हैं, उन्हें ही यदि वन विभाग के स्थानीय कार्यों से बाहर कर दिया गया तो इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। संघ ने आशंका जताई है कि रोजगार के अवसर कम होने से बेरोजगारी बढ़ सकती है और ग्रामीणों के बड़े पैमाने पर पलायन की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।
वन संरक्षण व्यवस्था पर भी उठाए सवाल
वन कर्मचारी संघ का कहना है कि स्थानीय ग्रामीणों और वन विभाग के फ्रंट लाइन कर्मचारी मिलकर जंगलों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्थानीय लोगों की क्षेत्र, जंगल और वन्यजीवों से जुड़ी जानकारी वन संरक्षण व्यवस्था को मजबूत बनाती है।
संघ ने आशंका जताई है कि यदि वन विभाग के कार्यों में स्थानीय भागीदारी कम हुई और व्यवस्था अत्यधिक व्यावसायिक एवं ठेका आधारित हुई तो वन संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। संघ के अनुसार इससे अवैध कटाई की रोकथाम, वन्यजीवों की सुरक्षा और जंगलों की निगरानी जैसी व्यवस्थाओं के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
फ्रंट लाइन स्टाफ की प्रस्तावित स्थानांतरण नीति का भी विरोध
वन कर्मचारी संघ ने फ्रंट लाइन स्टाफ अर्थात वर्दीधारी मैदानी बल की पदस्थापना एवं स्थानांतरण के लिए प्रस्तावित नई विभागीय स्थानांतरण नीति का भी पुरजोर विरोध किया है।
प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुवे ने कहा कि छत्तीसगढ़ शासन, वन विभाग के पत्र क्रमांक 3371/910/2019/10-1/1, दिनांक 18 अक्टूबर 2019 के माध्यम से फ्रंट लाइन स्टाफ की पदस्थापना एवं स्थानांतरण से संबंधित विसंगतिपूर्ण व्यवस्था को लेकर पूर्व में भी आपत्ति दर्ज की जा चुकी है। संघ का कहना है कि इसके बावजूद यदि कर्मचारियों के हितों को प्रभावित करने वाली नई व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया जाता है तो इससे विभागीय कर्मचारियों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
संघ ने मांग की है कि फ्रंट लाइन कर्मचारियों की पदस्थापना और स्थानांतरण नीति तैयार करते समय मैदानी परिस्थितियों, सेवा अवधि, स्थानीय आवश्यकताओं, कर्मचारियों की कठिनाइयों और विभागीय कार्य की प्रकृति को प्राथमिकता दी जाए।
‘ग्रामीण, वनवासी और कर्मचारी हितों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं’
प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुवे ने कहा कि वन विभाग केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह जंगलों, वनवासियों, ग्रामीणों और मैदानी कर्मचारियों के साथ सीधे तौर पर जुड़ा विभाग है। इसलिए विभागीय नीतियां बनाते समय स्थानीय परिस्थितियों और हितधारकों की वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण पांडे की ओर से प्रस्तावित व्यवस्थाओं पर संघ की आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि वन कर्मचारी संघ ग्रामीणों, वनवासियों और कर्मचारियों के हितों से जुड़े मुद्दों पर पीछे नहीं हटेगा।
मांगें पूरी नहीं हुईं तो प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि वन विभाग में प्रस्तावित ठेका पद्धति को वापस नहीं लिया गया, फ्रंट लाइन स्टाफ की विसंगतिपूर्ण स्थानांतरण नीति पर रोक नहीं लगाई गई तथा वनवासियों, ग्रामीणों और कर्मचारियों के रोजगार एवं सेवा हितों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो संघ प्रदेशव्यापी आंदोलन का रास्ता अपनाएगा।
संघ ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर कार्य बहिष्कार का निर्णय भी लिया जा सकता है। संघ के अनुसार ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर इसकी जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन एवं शासन की होगी।
वन कर्मचारी संघ ने शासन से आग्रह किया है कि किसी भी नई नीति अथवा व्यवस्था को लागू करने से पहले वन कर्मचारियों, ग्रामीणों, वनवासियों और अन्य संबंधित पक्षों से संवाद किया जाए तथा ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे वन संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय रोजगार और कर्मचारियों के सेवा हित भी सुरक्षित रह सके।
